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कोयला खनन कार्य बल कार्ययोजना (अंग्रेजी में) - पीडीएफ फॉर्मैट
| CLM-06-01 | कोयला संसाधन प्रौद्योगिकी पर सूचनाओं का आदान-प्रदान* |
| CLM-06-02 | कोयला लाभप्रदीकरण:आर्थिक मॉडलिंग, विश्लेषण एवं मामले का अध्ययन |
| CLM-06-03 | परिष्कृत कोयला लाभप्रदीकरण-संयुक्त परियोजना |
| CLM-06-04 | कोयले को सुखाने पर जानकारियों की अदला-बदली - (पूर्ण) |
| CLM-06-05 | अपशिष्ट कोयला प्रबंधन पर संयुक्त परियोजना - (पूर्ण) |
| CLM-06-06 | ढलवां कोयले का निष्कर्षण - (रद्द) |
| CLM-06-07 | खनन उद्योग के लिए टिकाऊ विकास कार्यक्रम के अग्रणी प्रयोग |
| CLM-06-08 | अतिभारित ढलान की स्थिरता - (पूर्ण) |
| CLM-06-09 | कोयला खदान स्वास्थ्य एवं सुरक्षा* |
| CLM-06-10 | पारंपरिक खदानों का खतराविहीन खान के रुप में उद्धार - (रद्द) |
| CLM-06-11 | कोयला खान मीथेन का बढ़ता अधिग्रहण एवं उपयोग* |
| CLM-06-12 | समेकित कोयला एवं मीथेन निष्कर्षण |
| CLM-06-13 | सघन परतदार कोयले का निष्कर्षण |
| CLM-06-14 | भारत में भूतल कोयला गैसीकरण - (पूर्ण) |
| CLM-06-15 | कार्यबल मूल्यांकन एवं प्रशिक्षण आवश्यकता - (रद्द) |
| CLM-06-16 | कोयला क्षेत्र की आग पर नियंत्रण हेतु तकनीकी विकास |
| CLM-07-17 | कोयला खदान अग्नि बचाव, नियंत्रण |
| CLM-07-18 | भारत में भूमिगत कोयले के गैसीकरण का त्वरण - चरण-2 यूसीजी निरूपण |
| CLM-08-19 | ध्वनिक बोरहोल चित्रण प्रणाली से 3-डी भूगत सर्वेक्षण - (रद्द) |
| CLM-08-20 | भूमिगत कोयला खान गतिविधियों के लिए इन-सीम भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण - (रद्द) |
| CLM-08-21 | वायु संचार मैथेन उत्सर्जन: भारतीय खनन परिदृश्य में इसे घटाना और उपयोग में लाना - (रद्द) |
| CLM-08-22 | चीन के कोयला खनन क्षेत्रों में भू-पुनरुपयोग के लिए तकनीकी मानकों एवं नियमों का विकास |
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यह परियोजना कोयला बनाने की प्रौद्योगिकियों में श्रेष्ठतर प्रयोगों से संबंधित सूचनाओं को साझेदार देशों में पहुंचाने की पहल करती है। साझेदार देशों में दहन-पूर्व कोयले की अभिक्रिया (उपचार) के तरीके और प्रौद्योगिकी अलग-अलग हैं। कुछ साझेदार देशों में कोयला तैयार करने में इस्तेमाल की जा रही सबऑप्टिमल प्रणाली को कारगर बनाने के लिए यह जरूरी है कि अन्य साझेदार देशों के अनुभवों का लाभ उठाया जाए। अभी तक अलग-अलग देश सर्वश्रेष्ठ प्रयोगों को अपनाने के लिए द्विपक्षीय सहयोग करते रहे हैं। यह टास्क फोर्स परियोजना सभी साझेदार देशों को बेहतरीन प्रयोगों के बारे में आपस में अनुभव बांटने का अवसर प्रदान करती है। भारत और अमेरिका इस परियोजना के सदस्य देश हैं।
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यह परियोजना साझेदार देशों के लिए प्रभावी कोयला लाभप्रदीकरण योजनाओं के निर्धारण हेतु एक कोयला लागत मॉडल तैयार कर रही है। यह उस कोयला-लाभप्रदीकरण परियोजना से संबद्ध है, जो भारत पर केंद्रित होगी। (देखें परियोजना 3: उत्कृष्ट कोयला लाभप्रदीकरण-संयुक्त कार्य परियोजना)। यह परियोजना कोयला प्रसंस्करण किफायती बनाने और उसकी क्षमता में वृद्धि के लिए प्रयुक्त कोयला सफाई प्रौद्योगिकियों और प्रयोगों का एक अंग होगी। कोयला लाभप्रदीकरण स्पष्ट रूप से उर्जा सुरक्षा, प्रदूषण को कम करने और जीवन की बेहतरी में योगदान करता है। भारत और अमेरिका इस परियोजना के साझेदार देश हैं।
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यह परियोजना कोयला-लाभप्रदीकरण से जुड़े मुद्दों पर गौर करती है। कोयला-लाभप्रदीकरण के लिए आवश्यक है कि कोयले को एक आदर्श आकार में तोड़ा जाए। इस प्रक्रिया के दौरान कोयले के बारीक टुकड़े निकलते हैं, जिनका प्रक्षालन मुश्किल होता है। यह समस्या खास तौर पर भारत में अधिक है, जहां उत्कृष्ट कोयले में राख की मात्रा अधिक होती है और अतिउत्कृष्ट कोयले को तो निष्क्रिय तत्वों से अलग करना और कठिन हो जाता है। उत्कृष्ट कोयले के प्रक्षालन की समस्या अमूमन सभी साझीदार कोयला उत्पादक देशों के साथ है। इसलिए उत्कृष्ट कोयले को उन्नत किस्म में बदलने के लिए उपयुक्त प्रक्रिया विकसित किए जाने की जरूरत है, ताकि अधिकतम स्वच्छ कोयला प्राप्त किया जा सके। इसकेलिए उन्नत गुरुत्व पृथक्करण प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा सकता है। भारत और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना कोयला-लाभप्रदीकरण के बाद होने वाली प्रक्रिया में जल्दी सूखाने के बारे में साझेदार देशों के बीच सूचनाओं व अनुभवों का आदान-प्रदान करेगी। इस संदर्भ में यह ऑस्टे्रलियाई प्रौद्योगिकी के अनुभवों पर पर्याप्त ध्यान देगी। कोयले का ताप शुष्कन आम तौर पर कोयला लाभप्रदीकरण का हिस्सा नहीं है और न ही यह उपभोक्ताओं की सुविधाओं या कोयला बनाने वाले कारखानों का। हालांकि इस संदर्भ में ऑस्टे्रलियाई अध्ययन दर्शाता है कि इसके लिए लागू किए जाने से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। साझेदार देश कोयले को सुखाने की प्रौद्योगिकी की अदला-बदली करेंगे, ताकि वे पर्यावरण के हित में कदम उठा सकें। ऑस्टे्रलिया इस परियोजना का साझेदार देश है।
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कोयला-लाभप्रदीकरण प्रक्रिया में निकलने वाले बेकार कोयले के प्रबंधन पर यह परियोजना केन्द्रित है। विशेष रूप से इसका ध्यान भारत में कोयला-लाभप्रदीकरण परियोजना पर होगा। कोयला लाभप्रदीकरण परियोजना बड़ी मात्रा में अनुपयोगी कोयला उत्पन्न करती है और काफी मात्रा में अनुपयोगी कार्बन होता है, जिसके गरम और आर्द्रता वाले देशों में खदानों से बाहर निपटारे में ऑक्सीकरण के कारण पर्यावरणीय जोखिम पैदा होती है। फिर इससे ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोत का भारी नुकसान भी होता है। यह परियोजना साझेदार देशों में कोयला लाभप्रदीकरण प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले अनुपयोगी कोयले के कारण ऊर्जा की क्षति को कम करने पर काम कर रही है। भारत इस परियोजना में साझेदारी कर रहा है।.
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लगभग 30 डिग्री से अधिक के कोण में खड़े कोयले के भंडार को ‘खड़ी परत वाले’ कोयले के रूप में जाना जाता है। ऐसे कोयले का खनन बेहद मुश्किल होता है। इस परियोजना का उद्देश्य है उत्कृष्ट उत्पादन को प्राप्त करना। इसके लिए अत्याधुनिक खनन तकनीकी का इस्तेमाल करते हुए खड़े परतदार कोयले से उपयोगी कोयला निकाला जाए। यह परियोजना भारत, विशेषकर इसके पूर्वोत्तर इलाके की अनूठी विशेषताओं वाली कोयला खदानों पर केंद्रित होगी। उम्मीद है कि इस वक्त अमेरिका में इस तरह की खदानों में जो खनन प्रणाली अपनाई गई है, उनका इस्तेमाल किए जाने से देश में खड़े परतदार कोयला भंडारों से कोयले का उत्पादन बढ़ेगा। अमेरिका और भारत इस परियोजना में भागीदारी कर रहे हैं।
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विश्वसनीय खनन कार्य के लिए मार्गदर्शक उपलब्ध कराने हेतु साझेदार देशों की खनन नियंत्रक एजेंसियों, खान मंत्रालय, शोध संगठनों और सामुदायिक समूहों के साथ मिलकर यह कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है। यह कार्यक्रम खनन उद्योग की सामुदायिक अपेक्षाओं का महत्व जानता है और टिकाऊ विकास के लिए खनन उद्योग के मानकों के अनुकूल है, जिनमें वर्ष 2003 में खनन और धातु पर अंतरराष्ट्रीय परिषद द्वारा दीर्घकालिक विकास कार्य के संदर्भ में जारी दस सिद्धांत शामिल हैं। खनिज उद्योग के दीर्घकालिक विकास के लिए अग्रणी मार्गदर्शक कार्यों को बताने व सहायता का काम ऑस्ट्रेलिया कर रहा है। यह कार्यक्रम साझेदार देशों के उद्योग एवं सरकार के लिए मार्गदर्शन के साथ-साथ कुछ खास मसलों पर विश्व भर में कोयला उद्योग से जुड़े लोगों को सूचनाएं मुहैया कराएगा। परियोजना में ऑस्टे्रलिया, भारत और अमेरिका साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना साझेदार देशों में कोयला खनन की अभियांत्रिकी योजना डिजाइन और विकसित करने का काम कर रही है, ताकि अतिभारित खदानों से सुचारू निकासी और व्यवस्था, जटिल पंपिंग प्रणाली का अधिष्ठापन, अतिभार वाली ढेरों की देखरेख तथा ढलान विफलता को ढूंढने के लिए अतिभारित ढेरों में सेंसर लगाई जा सके। यह परियोजना भारत के खुले खदान क्षेत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। अतिभारित ढेर की विभिन्न तकनीकी विशेषताओं का मूल्यांकन किया जाएगा, जिसमें फेरेटिक भूतल, ढेर की ढाल, ढलान हलचल की दर और ढेर की विफलता का अनुमान आदि शामिल हैं। अतिभारित ढेर में कम खर्च में सेंसर की स्थापना और लेजर आधारित बाहरी सर्वेक्षण व्यवस्था इस परियोजना के तहत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का हिस्सा होंगी। भारत और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना साझेदार देशों के कोयला खनन उद्योग को दुर्घटनाविहीन करने एवं जोखिम प्रबंधन के लिए एक अनुकूल उपाय तैयार कर रही है। इस परियोजना के तहत स्वचालन, बचाव कार्यों का विस्तार, विकसित संचार एवं नियंत्रण क्षमता और मॉनीटरिंग प्रक्रिया के कार्य शामिल किए जाएंगे। साझेदार देश कोयला खदानों में काम करने वालों के स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं जोखिम प्रबंधन हेतु एक वैधानिक ढांचा तैयार करेंगे। यह परियोजना साझेदार देशों में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा खतरे को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण कार्यों की भी परख रही है। ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना साझेदार देशों के कोयला खान क्षेत्र, खासकर पारंपरिक कोयला खदानों के उद्धार से जुड़े खतरों को कम से कम करने का काम कर रही है। इस परियोजना का विशिष्ट लक्ष्य कोयला खनन के विपरीत प्रभावों से पर्यावरण एवं समाज के संरक्षण के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाना है। इसके लिए यह परियोजना साझेदार देशों में इन संरक्षण कार्यक्रमों, कृषि उत्पादकता और उर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बिठा रही है। यह परियोजना उन खान क्षेत्रों के उद्धार को बढ़ावा देगी, जहां की भूमि का पर्याप्त उद्धार नहीं किया गया और अपनी वर्तमान स्थिति में जो पर्यावरण क्षमता को विकृत करते हैं, जल-संसाधनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और जन स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए जोखिम बने हुए हैं। अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहा है।
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यह परियोजना साझेदार देशों खासकर चीन और भारत में खानों की सुरक्षा में सुधार करने और कोयला मीथेन व कोल बेड मीथेन के उत्पादन में वृद्धि करने पर काम कर रही है। इसके लिए यह पहले से जारी खनन कार्य में अधिक प्रभावकारी तरीके से छेद करने और निकास की प्रौद्योगिकी तकनीकी के प्रयोग को बढ़ावा देगी। साथ ही निम्न स्तरीय कोयला खान मीथेन की प्राप्ति और इस्तेमाल को भी प्रोत्साहित करेगी। चीन, भारत और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना साझेदार देशों, मुख्यत: ऑस्टे्रलिया और चीन में कोयला खानों की सुरक्षा में सुधार करने तथा कोयला खान मीथेन व कोयला बेड मीथेन के उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए काम कर रही है। इसके लिए यह कोयला उत्पादन एवं मीथेन निष्कर्षण अप्रोच के इस्तेमाल को प्रोत्साहित व प्रदर्शित करने, भरोसेमंद योजना बनाने और संयुक्त उत्पादन प्रक्रिया की आशा पैदा करने तथा साथ ही प्रभावकारी परिचालन नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन प्रौद्योगिकियों की दिशा में काम कर रही है। यह परियोजना साझेदार देशों में कोल उत्पादन और मीथेन निष्कर्षण को प्रोत्साहित करने एवं सहायता करने के लिए समेकित अप्रोच व प्रौद्योगिकी की मदद लेगी। ऑस्टे्रलिया, चीन और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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इस परियोजना का सबसे बड़ा परिणाम है, भारतीय सघन परतदार वातावरण में खनन कार्य की सुरक्षा और बेहतर उत्पादन प्राप्ति की रूपरेखा और/या खनन पद्धति की उम्मीद बनना। यह परियोजना भारत और ऑस्टे्रलिया के सघन परतदार वातावरण पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। इसलिए सघन परतदार खनन कार्यों के विभिन्न विकल्पों की तत्काल विस्तृत पड़ताल की जरूरत है। साथ ही इनके अनुकूल खनन प्रौद्योगिकी विकसित या अभिकल्पित करने की आवश्यकता है, ताकि इन दोनों साझेदार देशों के सघन परतदार वातावरण में कोयले उत्पादन में बढ़ोतरी हो सके। भारत और ऑस्टे्रलिया इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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यह परियोजना भूमिगत कोयला गैसीकरण में भारत के हितों पर केंद्रित है। भूमिगत कोयला गैसीकरण (यूसीजी) भूतल में ऊर्जा संसाधनों के मूल्यांकन की एक माकूल प्रौद्योगिकी है। साथ ही यह इन संसाधनों के दोहन, विद्युत उत्पादन के लिए सिंथेटिक गैस, कृत्रिम तरल ईंधन, प्राकृतिक गैस या रसायनों के उत्पादन की कम खर्चीली तकनीक है। यह परियोजना भारत व अन्य साझेदार देशों में इस संबंध में प्रयुक्त श्रेष्ठ प्रयोगों जैसे नियंत्रण प्रबंधों के अनुभवों, भूजल पर गैसीकरण के प्रभावों और प्रशमण उपायों के बारे में जानकारियां आदान-प्रदान करेगी। भारत और अमेरिका इसके साझेदार देश हैं।
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इस परियोजना का अपेक्षित परिणाम है, साझेदार देशों में खनन कौशल की कमी की समस्या को दूर करने के लिए एक अनुकूल अप्रोच (प्रस्ताव) का विकास, जिसमें तकनीकी चूकों को कम करने के लिए कौशल के अभावों और प्रशिक्षण के अवसरों की पहचान शामिल है। यह योजना इस संदर्भ में साझेदार देशों में जारी कार्यों व नीतियों पर सूचनाएं आदान-प्रदान करेगी, क्षमता बढ़ाने के क्षेत्र पहचानेगी तथा इस मामले से संबंधित जानकारियों व विकसित प्रारूपों का हस्तांतरण करेगी। कार्यबल द्वारा स्वीकृत सामूहिक प्रस्ताव साझेदार देशों को सक्षम बनाएगा, ताकि वे अपने देश में इस समस्या से प्रभावी तरीके से निपटने की रणनीति बना सकें।
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यह परियोजना दहकते कोयले की एक परत से एक मीटर के भीतर की आग के ठीक-ठीक परिणाम के निर्धारण के साथ ही ऐसे आग की स्थानिक व्याप्ति के निर्धारण पर भी काम कर रही है। यह चीन के शिन्जिआंग इलाके पर केंद्रित होगी। चीन में शिन्जिआंग की विचित्र भूवैज्ञानिक एवं भौगोलिक स्थिति के कारण यहां के कोयला खानों की आग काफी प्रचंड होती है। मौजूदा प्रौद्योगिकी की सीमाओं के कारण यहां की आग की गहनता और विस्तार का आकलन नहीं किया जा सकता। तब तो और, जब वहां आग 100 मीटर से अधिक गहरी खदानों में लगी हो और तापमान 500 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो। इसलिए यह सामूहिक सक्रियता कोयला खान की आग की मौजूदा प्रौद्योगिकी में सुधार के लिए चीन को महत्वपूर्ण सूचनाएं मुहैया कराएगी। चीन इस परियोजना का साझेदार देश है।
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हाल के वर्षों में कोयला खदानों की आग में काफी वृद्धि हुई है और विकसित देशों के समान ही विकासशील देशों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यह परियोजना ऑस्टे्रलिया और भारत में कोयला खानों का जमीनी मुआयना करेगी और विभिन्न खनन स्थितियों के लिए उपयुक्त नियंत्रण रणनीति विकसित करेगी। ये प्रस्ताव/रणनीतियां कोयला खनन उद्योग की आर्थिकी और सुरक्षा में पर्याप्त सुधार से पुष्ट होंगी। साथ ही इनमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की क्षमता होगी। ऑस्टे्रलिया और भारत इन परियोजना के साझेदार देश हैं।
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भूमिगत कोयला गैसीकरण (यूसीजी) जहां अगम्य कोयले की बड़ी मात्रा के मूल्यांकन को संभव बनाता है, वहीं उसके निष्कर्षण को कम खर्चीला भी बनाता है। साथ ही यह सिनगैस (हाइड्रोजन और कार्बन डाईऑक्साइड) के रूप में ऊर्जा उपलब्ध कराता है, जो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा और तरल ईंधन प्रौद्योगिकी का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह परियोजना विशिष्ट भारतीय खानों में यूसीजी के प्रथम चरण के अध्ययन पर निगाह जमाए हुए है और यह भारत में एक यूसीजी प्रदर्शन के जरिए यह साबित करेगी कि यूसीजी प्रारूप बड़े व्यावसायिक विद्युत केंद्रों की जरूरतों के अनुसार विस्तृत किया जा सकता है। ऑस्टे्रलिया और भारत इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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इस परियोजना का उद्देश्य है भूमिगत कोयला पट्टियों और उनके ऊपर की भूपरतों के भूविज्ञानिक तत्वों का त्रि-आयामी (3-डी) चित्र तैयार करने की गति बढाना और खर्च कम करना। कोयला केन्द्रक तक पूर्ण ड्रिलिंग महँगी भी है और इसमें समय भी बहुत लगता है। 3-डी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और बोरहोल ध्वनिक चित्रण भूमि के नीचे के सघन आंकड़े उपलब्ध करा के ड्रिलिंग परिणामों और पर्यवेक्षण बचत, दोनों में वृद्धि करता है। इस परियोजना के अंतर्गत इन तकनीकों के प्रशिक्षण का विस्तार किया जायेगा और भूमिगत कोयला परतों का त्रि-आयामी भोवैज्ञानिक नमूना तैयार किया जायेगा। भारत और अमेरिका इस परियोजना में साझेदारी कर रहे हैं।
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इस परियोजना का लक्ष्य है छोटे मोटे भूवैज्ञानिक दोषों और विच्छेदों के स्थान-निर्धारण के ज़रिये भूमिगत खनन से त्वरित उत्पादन संभव बनाना। इन-सीम भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण तकनीकें भूगत कोयला उत्पादन में वृद्धि करती हैं क्योंकि इनके ज़रिये भगत खदानों में कार्मिकों को भेजने से पहले ही कोयला-सीम के पूरे ढांचे का दूर से मापन किया जा सकता है। यह परियोजना इन-सीम भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण तकनीकों का आदान - प्रदान सुगम बनाएगी और चुनी हुई खानों में इस टेक्नोलॉजी के ज़रिये सर्वेक्षण करेगी। इस परियोजना में भारत और अमेरिका भागीदार हैं।
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परियोजना का लक्ष्य है भारत में कोयला-तल वायु संचार मैथेन (वीएएम) के बारे में आंकड़ों का ऐसा आधार तैयार करना जिससे कोयला-तल मैथेन के रिसाव के स्रोतों का और बिजली उत्पादन या ऑक्सीकरण में इसके उपयोग की संभावना का पता लगाने में सहायता मिले। साथ ही इससे वातावरण में मैथेन उत्सर्जन में कमी आएगी। भूगत खानों से निकलने वाली हवा में वायु-संचार मैथेन गैस मौजूद होती है। और विश्व भर में कोयला खानों से निकलने वाली मैथेन का यह सबसे बड़ा स्रोत है, जो कोयला खानों से ऐसे उत्सर्जन के 50 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है। भारत में कुल भूगत मैथेन उत्सर्जन अनुमानतः लगभग 21 करोड़ 38 लाख मेट्रिक टन है। भारत में कुल भूगत मैथेन उत्सर्जन अनुमानतः लगभग २१ करोड़ ३८ लाख मेट्रिक टन है। इस योजना के तहत भूमिगत खानों से वायु संचार के नमूने एकत्र किये जायेंगे और उनका विश्लेषण किया जाएगा ताकि आंकड़ों का ऐसा आधार तैयार हो जो वीएएम उपयोग के स्थल चुनने में सहायक हो। इस परियोजना में भारत और अमेरिका भागीदार देश हैं।
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एपीपी साझेदार देशों में भूमि को फिर उपयोगी बनाने के लिए जो उपाय और तकनीकी मानक इस्तेमाल किये जा रहे हैं, और जिन्हें चीन में खनन से प्रभावित भूमि के उद्धार के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, यह परियोजना उनकी पहचान करेगी और उनका मूल्यांकन करेगी। क्रमबद्ध स्थल-मूल्यांकनों और साझेदार देशों के विशेषज्ञों के साथ तकनीकी आदान प्रदान के बाद चीन, तकनीकी मानकों, नियमों और प्रबंधन पद्धतियों में सुधार के लिए सुझाव तैयार करेगा, ताकि नीति निर्माता चीन में भूमि को फिर उपयोग योग्य बनाने के लिए इन्हें काम में ला सकें। चीन, ऑस्ट्रेलिया, कैनाडा, भारत, और अमेरिका इस योजना में भागीदार हैं।